कर प्रणाली की खामियों को दुरुस्त किया जाना सर्वहितकारी

अरुण राघव गाजियाबाद, सामान्य रूप से शासन सम्बंधी कार्यसंचालन हेतु आम जनमानस लगाए जाते हैं। कर (टैक्स) को सामान्यतः राजस्व वृद्वि का ही साधन माना जाता है परन्तु राष्ट्र की अर्थनीति को भी कर (टैक्स) प्रणाली प्रभावित करती है। कर लगाने का उद्देश्य चिरकाल से विकास कार्याे के लिए धन एकत्र करना व यथासंभव राष्ट्र की विषमता को दूर करना है। यही कारण है कि जिनकी अधिक आय है, उन्हे कम आय वालों की अपेक्षाकृत अधिक कर देना पडता है। शासन की अन्य नीतियों के सामंजस्य पर आधारित कराधान का व्यापक उद्देश्य जनता का अधिकाधिक कल्याण करना है। कराधान व्यवस्था से शासन को आर्थिक दृढता तो प्राप्त होती ही है, साथ ही सामाजिक और आर्थिक भलाई भी कर (टैक्स) द्वारा होती है। भारत मे भी प्राचीन काल से वर्तमान प्रत्यक्ष कर प्रणाली किसी ना किसी रूप मे चलती आ रही है। प्रायः यह मान्यता रही है कि कर वसूली की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जनता कर (टैक्स) की अदायगी करते समय कठिनाई महसूस ना करे। ठीक उसी तरह जैसे मधुमक्खी पुष्प से मधु इकठ्ठा करती है और पुष्प को कोई हानि भी नही पुहँचती। कर (टैक्स) व्यवस्था भी ठीक इसी प्रकार होनी चाहिए।

भारतीय कर (टैक्स) प्रणाली का इतिहास :
बता दें कि भारत मे आयकर लगाने और वसूलने की पद्वति को नियमित रूप देने के लिए 1922 में एक समेकित (कन्सालडैटड) अधिनियम पारित किया गया था। भारतीय आयकर अधिनियम 1922 की संज्ञा से ज्ञात यह अधिनियम 31 मार्च 1962 तक व्यवहार मे रहा। समय-समय पर इसमें संशोधन किए जाते रहे और अंत मे यह आवश्यक हो गया कि इसे बदल दिया जाए। सितम्बर 1961 मे राष्ट्रपति ने आयकर अधिनियम 1961 को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी और 1 अप्रैल 1962 से इस नए अधिनियम ने सन 1922 के अधिनियम का स्थान ले लिया।
वर्तमान समय मे आयकर व जीएसटी ( जो कि दिनांक 01 जुलाई 2017 को सम्पूर्ण हिन्दुस्तान मे लागु किया गया ) इन्हीं दो तरह के कर (टैक्स) से सरकार को मुख्यतः राजस्व प्राप्ति होती है।

वर्तमान कर (टैक्स) व्यवस्था की खामियां और उनका निवारण :
पूर्व प्रांतीय कार्यकारिणी सदस्य उत्तर प्रदेश एवं वरिष्ठ कर (टैक्स) अधिवक्ता अरुण कुमार राघव का कहना है कि वर्तमान कर प्रणाली मे अनेको खामियाँ है, जिनको दुरूस्त किया जाना सर्वहितकारी है।
1) जीएसटी अधिनियम में छोटे व्यापारियों के लिए कम्पोजीशन योजना की व्यवस्था की गई है। जिसके तहत डेढ़ करोड तक की टर्नओवर वाले छोटे व्यापारियों को सम्पूर्ण बिक्री पर मात्र एक प्रतिशत कर देना है। वर्ष 2019-20 से ऐसे छोटे व्यापारियो जिन्होंने कम्पोजीशन योजना अपनाई हुई है, उनको वार्षिक विवरणी अर्थात जीएसटीआर 4 जमा करना अनिवार्य किया गया है। वर्ष 2019-20 की उक्त वार्षिक विवरणी जीएसटीआर 4 दाखिल करने की अंतिम तिथि के समय कोरोना के कारण सम्पूर्ण भारत मे लाँक डाउन की स्थिति थी। जिस कारण पूरे भारत के हजारों छोटे व्यापारी जीएसटीआर 4 समय पर दाखिल नहीं कर सके। अब सामान्य स्थिति होने पर वह छोटा व्यापारी अपनी वर्ष 2019-20 की जीएसटीआर 4 दाखिल कर रहा है तो जीएसटी पोर्टल 10 हजार तक का विलम्ब शुल्क मांग रहा है, जो कि काफी अधिक है। अगर वर्ष 2019-20 की उक्त विवरणी दाखिल नहीं करते हैं तो आगामी वर्षाे की जीएसटीआर 4 दाखिल नहीं होगी अर्थात पहले वर्ष 2019-20 मे पोर्टल द्वारा मांगे गए विलम्ब शुल्क को जमा करे तत्पश्चात अगले वर्ष 2020-21 की जीएसटीआर 4 दाखिल होगी। जबकि वर्ष 2020-21 की जीएसटीआर 4 की अंतिम तिथि भी निकल चुकी है, जिससे वर्ष 2020-21 मे भी विलम्ब शुल्क रू 10 हजार की मांग पोर्टल द्वारा की जा रही है। जोकि पूर्णतया गलत है।
सुझाव :-
वर्ष 2019-20 तथा वर्ष 2020-21 हेतु जीएसटीआर 4 के विलम्ब शुल्क को समाप्त किया जाना चाहिए अथवा विलम्ब शुल्क कम किया जाना चाहिए, वर्तमान मे 10 हजार शुल्क काफी अधिक है।

2) जीएसटीएन के अधिकारियों व इंफोसिस के साॅफ्टवेयर इंजीनियरों के कार्यकलापों से जीएसटी को जितना सरल होना चाहिए था, वह उतना ही जटिल है। सरकार को जीएसटी के सरलीकरण की ओर ध्यान देना चाहिए। सरकार द्वारा बारम्बार यह कहा तो जाता है कि जीएसटी को सरल किया जा रहा है परन्तु जो संशोधन होता है, वह जीएसटी को सरल करने की बजाय और जटिल कर देता है। जीएसटी अधिनियम मे अब तक लगभग तीन हजार से अधिक संशोधन हो चुके हैं तथा अधिनियम के अनुपालन मे सैकड़ो से ज्यादा फार्म पोर्टल पर उपलब्ध है। परिणामस्वरूप यह अधिनियम इतना जटिल हो चुका है कि आम व्यापारी व कर अधिवक्ता इस अधिनियम के बोझ तले पिस कर रह गया है।
सुझाव :-
सरकार इस जटिल जीएसटी अधिनियम को समाप्त कर इसके स्थान पर एक ऐसा सरल जीएसटी अधिनियम लाए, जिससे करदाता को कर देने मे किसी प्रकार की परेशानी ना हो तथा जिसके अनुपालन हेतु कम से कम फार्म हो। वर्तमान स्थिति में जीएसटी व आयकर अधिनियम का दो प्रकार से अनुपालन हो रहा है, एक तो वह अधिनियम जो लिखित में है, दूसरा वह जो आँनलाईन पोर्टल के अनुसार श्रजित है। कहीं कहीं यह स्थिति दृष्टीगोचर होती है कि लिखित मे कुछ और है तथा आँनलाईन पोर्टल पर कुछ और है अर्थात लिखित अधिनियम और आँनलाईन पोर्टल पर विरोधाभास दिखाई देता है।

3) सरकार ने विलम्ब शुल्क को राजस्व प्राप्ति का श्रोत मान लिया है। जो कि पूर्णतया गलत है। आयकर व जीएसटी में वर्तमान मे विलम्ब शुल्क की राशि बहुत भारी है। कई बार देखा गया है कि कर (टैक्स) की राशी है दो हजार रूपये और विलम्ब शुल्क लग रहा है 10 हजार रूपये, ऐसा अधिकतर कम्पोजिशन अपनाने वाले छोटे व्यापारियों के साथ हो रहा है।
सुझाव :-
न्याय हित, व्यापार हित व राजस्व हित मे विलम्ब शुल्क को कम किया जाना चाहिए।

4) सरकार द्वारा जीएसटी व आयकर हेल्प लाईन पर जिन कर्मचारियों की नियुक्ति की गयी है, उनको जीएसटी व आयकर के विषय मे कोई ज्ञान नही है, जब हेल्प लाईन पर किसी समस्या हेतु बात की जाती है तो उनके द्वारा अनर्गल बातें की जाती है तथा पूछी गयी समस्या के निवारण हेतु उनके पास कोई जानकारी नहीं होती।
सुझाव :-
उक्त हेल्प लाईन को समाप्त कर दिया जाए या हेल्प लाइन पर ज्ञानवान कर्मचारियों की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाये। जिससे परेशान अधिवक्ताओं व व्यापारियो को पोर्टल के सम्बन्ध मे सही जानकारी प्राप्त हो सके।

5) जीएसटी में जो मासिक विवरणी 3बी दाखिल की जा रही है, उनमें संशोधन का प्रावधान नही हैं। जिससे एक बार जो गलती हो गई तो उसको दूुरूस्त नहीं किया जा सकता।
सुझाव :-
फार्म 3बी मे संशोधन की व्यवस्था हर माह की विवरणी मे होनी चाहिए, जिससे अनावश्यक विवाद समाप्त होंगे। अन्यथा जीएसटी विभाग भूल से हुई गलतियों पर भी नोटिस भेजता रहेगा और व्यापारी उन अनावश्यक नोटिसो का जवाब देता रहेगा और विभाग की नजरों मे चोर बनता रहेगा।

6) जहां कर (टैक्स) चोरी दृष्टिगत नहीं हो रही है। सिर्फ भूलवश गलती उजागर हुई है, वहाॅ भी सम्मन भेजे जा रहे हैं। ऐसा अधिकतर केन्द्रीय जीएसटी मे ही प्रायः देखा गया है।
सुझाव :-
केन्द्रीय व राज्य जीएसटी में जहां आवश्यक है, वहीं सम्मन अथवा नोटिस भेजे जाए। इस ओर सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है।

7) जीएसटी पोर्टल के सुचारू रूप से कार्य ना करने तथा रूक-रूक कर कार्य करने के कारण मिनटों का कार्य घंटों मे हो रहा है। ऐसी स्थिती मे सभी कर (टैक्स) अधिवक्तागण शारीरिक व मानसिक रूप से पीड़ित हो रहे हैं।
सुझाव :-
निःसंदेह सरकार की कार्यप्रणाली भारत वर्ष के उज्जवल भविष्य के लिए उत्तम है परन्तु सरकार को इस ओर ध्यान देने की अति आवश्यकता है।

8) आज के समय मे डीजल पेट्रोल के दाम लगातार बढ रहे हैं। जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
सुझाव :-
पैट्रोलियम पदार्थो को जीएसटी के दायरे मे लाया जाए।

9) आयकर में छोटे-छोटे मिसमैच के मामलों मे भी एक बड़ी संख्या में लिमीटेड स्क्रुटनी के नोटिस भेजे जाते हैं। जिससे छोटे व्यापारियों का अनावश्यक उत्पीड़न होता है।
सुझाव :-
अनावश्यक छोटे-छोटे मिसमैच पर नोटिस से आम करदाता मानसिक रूप से व आर्थिक रूप से प्रताड़ित न हो, कृप्या इस ओर भी सरकार अपना ध्यान आकृष्ट करें।

जीएसटी तथा आयकर के क्रियान्वयन में सरकार को अपना हस्तक्षेप करते हुए वर्तमान व्यवस्था की खामियों को दुरूस्त किया जाना चाहिए, जिससे जीएसटी व आयकर भारतीय अर्थव्यवस्था मे मील का पत्थर साबित हो।

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